“मराठी मानुस से आगे बढ़ा मुंबई!” BMC में ठाकरे ब्रांड ध्वस्त

भोजराज नावानी
भोजराज नावानी

महाराष्ट्र की राजनीति में आज ऐसा राजकीय सूर्योदय हुआ है, जिसने दशकों पुराने सियासी किलों को इतिहास की किताबों में धकेल दिया।
देश की सबसे अमीर महानगरपालिका BMC (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) के नतीजों और रुझानों ने यह साफ कर दिया है कि मुंबई की गलियों में अब सिर्फ “मराठी मानुस” नहीं, बल्कि “विकास, संगठन और सत्ता” की आवाज़ गूंज रही है।

जिस BMC में कभी ठाकरे परिवार की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था, वहां अब महायुति (BJP-Shinde Sena) ने ऐसी सेंध लगाई है कि विपक्षी खेमा पूरी तरह आऊट ऑफ गेम नज़र आ रहा है।

Mahajyuti Tsunami: BMC का नया भगवा अवतार

महाराष्ट्र की 29 नगर निगमों और खासतौर पर BMC में भाजपा अब सिर्फ पार्टी नहीं, बल्कि राजनीतिक मशीन बन चुकी है। कुल 2869 वार्डों में से 1553 के रुझान बताते हैं कि भाजपा अकेले दम पर आधे से ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाए हुए है।

जब इसमें मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना का असर जोड़ा जाए, तो महायुति दो-तिहाई बहुमत के साथ BMC पर काबिज़ होती दिख रही है।

यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इसने उद्धव और राज ठाकरे के “Marathi Pride Campaign” को पूरी तरह नकार दिया।

मुंबईकर का verdict साफ है — “भावना नहीं, व्यवस्थापन चाहिए!”

Strategic Blunder: Raj Thackeray का साथ पड़ा भारी

उद्धव ठाकरे का कांग्रेस से दूरी बनाकर MNS के साथ जाना एक आत्मघाती चाल साबित हुई। राज ठाकरे की उत्तर भारतीय विरोधी छवि। कमजोर सांगठनिक ढांचा। अवसरवादी राजनीति का पुराना रिकॉर्ड इन सबका सीधा असर यह हुआ कि उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय वोट बैंक एकमुश्त भाजपा की झोली में चला गया।

उधर कांग्रेस से दूरी ने अल्पसंख्यक वोट भी छिटका दिया। नतीजा — उद्धव ठाकरे न कट्टर हिंदुत्व को साध पाए, न सेक्युलर वोट को।

Thackeray Brand का क्षरण और Ground Disconnect

एक समय था जब “ठाकरे” नाम ही मुंबई में जीत की गारंटी माना जाता था। लेकिन 2022 के विभाजन के बाद यह ब्रांड लगातार कमजोर होता गया। चुनाव आयोग द्वारा शिंदे गुट को असली शिवसेना का दर्जा। धनुष-बाण का सिंबल खोना। कार्यकर्ताओं में नेतृत्व को लेकर असमंजस।

सबसे बड़ी बात — जनता के बीच यह धारणा बन गई कि “ठाकरे परिवार अब मैदान में नहीं, महलों में सिमट गया है।”

इसके उलट, Devendra Fadnavis और Eknath Shinde की जोड़ी ने grassroot politics खेली — सड़क, बस्ती और वार्ड तक पहुंच बनाई।

Development Agenda और ‘Brand Fadnavis’ का Rise

इन नतीजों ने यह भी साबित कर दिया कि मराठी वोटर अब सिर्फ भावनात्मक अपील से नहीं, बल्कि delivery और governance से फैसला कर रहा है। मुंबई की 30–35% गैर-मराठी आबादी (उत्तर भारतीय, गुजराती, बनिया), एकजुट होकर महायुति के साथ खड़ी हुई। BJP ने BMC चुनाव को mini-assembly election की तरह लड़ा। Strong organization + resources + Shinde Sena को equal respect — यही रहा winning formula

अब महाराष्ट्र की राजनीति में Devendra Fadnavis की छवि एक बार फिर Political Chanakya के रूप में उभर रही है।

“भावना होती है गरम, पण मतदार पाहतो काम!”

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